मेरी कविता.. . यादों की बारिश... . मन मयूर नाच उठा

"मेरी कविता.. . यादों की बारिश... . मन मयूर नाच उठा, भीग कर सावन की बारिश में, बैठी हूँ वो कश्ती लेकर कागज की, फिर तैराने की ख़्वाहिश में। . बहा ले जा रही ये बूंदे मुझे, बचपन की यादों में, सन कर जब आती थी मैं घर, कीचड़ व कादो में। . (इन गीली परछाइयों ने (बादलों ने) यादों की बारिश की हैं आज।) . मन आतुर हो उठा फिर, भीगकर पिट्ठू व फुटबॉल खेलने को, सन जाउँ मिट्टी में फिर, पीठ से लगाऊँ माँ के बेलने को। . जब कभी इन बूंदों के साथ, नन्हे सफेद गोले भी बरसते हैं, उन गोलों को दादाजी के कुर्ते में डाल, भागने को तरसते हैं। . माँ के हाँथ के गर्मागर्म पकोड़े खा..बारिश मे फिर झूमने का मन हो जाता है, कुछ बंदिशें हैं अब, वरना ऐसे मौसम का मज़ा लेने से , खुद को कौन रोक पाता है...खुद को कौन रोक पाता है।- by शाम्भवी। ©Shambhavi chandra"

 मेरी कविता..
.
यादों की बारिश...
.
मन मयूर नाच उठा,
भीग कर सावन की बारिश में,
बैठी हूँ वो कश्ती लेकर कागज की,
फिर तैराने की ख़्वाहिश में।
.
बहा ले जा रही ये बूंदे मुझे,
बचपन की यादों में,
सन कर जब आती थी मैं घर,
कीचड़ व कादो में।
.
(इन गीली परछाइयों ने (बादलों ने)
यादों की बारिश की हैं आज।)
.
मन आतुर हो उठा फिर,
भीगकर पिट्ठू व फुटबॉल खेलने को,
सन जाउँ मिट्टी में फिर,
पीठ से लगाऊँ माँ के बेलने को।
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जब कभी इन बूंदों के साथ,
नन्हे सफेद गोले भी बरसते हैं,
उन गोलों को दादाजी के कुर्ते में डाल,
भागने को तरसते हैं।
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माँ के हाँथ के गर्मागर्म पकोड़े खा..बारिश मे फिर झूमने का मन हो जाता है,
कुछ बंदिशें हैं अब,
वरना ऐसे मौसम का मज़ा लेने से ,
खुद को कौन रोक पाता है...खुद को कौन रोक पाता है।- by शाम्भवी।

©Shambhavi chandra

मेरी कविता.. . यादों की बारिश... . मन मयूर नाच उठा, भीग कर सावन की बारिश में, बैठी हूँ वो कश्ती लेकर कागज की, फिर तैराने की ख़्वाहिश में। . बहा ले जा रही ये बूंदे मुझे, बचपन की यादों में, सन कर जब आती थी मैं घर, कीचड़ व कादो में। . (इन गीली परछाइयों ने (बादलों ने) यादों की बारिश की हैं आज।) . मन आतुर हो उठा फिर, भीगकर पिट्ठू व फुटबॉल खेलने को, सन जाउँ मिट्टी में फिर, पीठ से लगाऊँ माँ के बेलने को। . जब कभी इन बूंदों के साथ, नन्हे सफेद गोले भी बरसते हैं, उन गोलों को दादाजी के कुर्ते में डाल, भागने को तरसते हैं। . माँ के हाँथ के गर्मागर्म पकोड़े खा..बारिश मे फिर झूमने का मन हो जाता है, कुछ बंदिशें हैं अब, वरना ऐसे मौसम का मज़ा लेने से , खुद को कौन रोक पाता है...खुद को कौन रोक पाता है।- by शाम्भवी। ©Shambhavi chandra

#OneSeason

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