कबो पगड़ी कबो चद्दर कबो पोछा नजर आइल। हर एक रूप में हमरा हमर गमछा नजर आइल।। जब से चलल बा बेमारी किरउना नाम के। मुख लंगोट के बदला हमर गमछा नजर आइल।। सोमेश त्रिव.
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