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Nothing to impress but a lot of to express
White क्या वो फिर ठीक था जिंदा दफनाया तुम्हें जाता था..! साथ शौहर की मैय्यत के मरवाया तुम्हें जाता था..!! मारे ग़ैरत के दीवार में चुनवाया तुम्हे जाता था..! पूत की चाह में कोख से गिरवाया तुम्हें जाता था..!! कोम की कोम पढ़े इसीलिए पढ़वाया तुम्हें जाता था..! बात इज़्ज़त पे ना आए यही समझाया तुम्हें जाता था..!! तुमने आख़िर क्यों एक बाप को शर्मसार किया..! क्यों भाई की इज़्ज़त को रुसवा सरे बाज़ार किया..!! तुमने क्या ख़ूब अपनी कोम को अज़मत बख्शी..! तुमने क्या ख़ूब दिन को ईमान को इज्ज़त बख्शी..!! तुमने आइंदा की निस्वानियत को गिरफ्तार किया..! सौ आफरी तुमपे की क्या ख़ूब ख़बरदार किया..!! आवारापन में आज़ादी में क्या कोई फ़र्क नहीं..! हिजाबों की ये रुसवाई क्या खुला नर्क नहीं..!! इक सवाल तो हर एक फर्द से अब बनता है..! भाई से बाप से हर एक मर्द से अब बनता है..!! क्या हमने कभी खुद को पाक ज़हन जाना है..! क्या दूसरे की बहन को बहन अपनी माना है..!! ©Abd
Abd
13 Love
White तिनका तिनका घर घरौंदा टूटा चूल्हा बर्तन औंधा बालू में से कंकर बीना ईंधन बना पत्तों का झीना फर्जी फर्जी दाल पकाई बच्चों को जब तक नींद ना आई लेकिन मां को भय था भोर का था सवाल बस चंद कोर का ब्याज ढले तो पो भी फटती तब जाके कहीं मूल से लड़ती कभी सीधी कभी उल्टी पड़ती बार बार करवटे बदलती झूठे सपनों में रोटी आई लेकिन सच्ची नींद ना आई भूख थी ज़्यादा पेट था ख़ाली मजबूरी में फिर बालू खाली भीतर पूरा रेगिस्तान हो गया जीवन ही वीरान हो गया ना पत्थर थी ना लक्कड़ थी अब चेतना बिल्कुल जड़ थी बच्चों से वज्रपात सहे ना काश कभी ये भोर भए ना ©Abd
10 Love
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